छत्तीसगढ़

महिला प्रशिक्षण अधिकारी के. अरुन्धती को हाईकोर्ट से बड़ी राहत

Shantanu Roy
1 Nov 2025 11:44 PM IST
महिला प्रशिक्षण अधिकारी के. अरुन्धती को हाईकोर्ट से बड़ी राहत
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Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महिला प्रशिक्षण अधिकारी के. अरुन्धती के स्थानांतरण आदेश पर अंतरिम स्थगन (स्टे) देते हुए राज्य शासन को निर्देश दिया है कि उन्हें पूर्व पदस्थापना स्थल महिला आईटीआई, दुर्ग में ही यथावत पदस्थ किया जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू की एकलपीठ ने सुनवाई के बाद पारित किया। कोर्ट ने मामले में याचिकाकर्ता की पारिवारिक और मानवीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह राहत प्रदान की है।
🔹 क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता के. अरुन्धती, जो सेक्टर-4, भिलाईनगर (जिला दुर्ग) की निवासी हैं, महिला आईटीआई कॉलेज, दुर्ग में प्रशिक्षण अधिकारी के पद पर कार्यरत थीं। हाल ही में तकनीकी शिक्षा एवं रोजगार विभाग, नवा रायपुर द्वारा जारी आदेश के तहत उनका स्थानांतरण बीजापुर जिले के लिए कर दिया गया था।
इस आदेश से असंतुष्ट होकर अरुन्धती ने अपने अधिवक्ताओं अभिषेक पांडेय और वर्षा शर्मा के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने कहा कि यह स्थानांतरण आदेश न केवल पारिवारिक दृष्टि से अनुचित है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी उल्लंघन करता है।
🔹 अधिवक्ताओं के तर्क
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से प्रमुख तर्क दिया गया कि अरुन्धती का पुत्र भव्य नायडु, वर्तमान में डीएवी पब्लिक स्कूल, दुर्ग में कक्षा चौथी का छात्र है। ऐसे में शैक्षणिक सत्र के बीच में मां का स्थानांतरण कर देना सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के खिलाफ है।
अधिवक्ताओं ने डायरेक्टर ऑफ स्कूल एजुकेशन, मद्रास बनाम ओ. करूप्पा थेवन एवं अन्य मामले में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि –
“जब किसी शासकीय कर्मचारी का बच्चा अध्ययनरत हो, तब मिड-सेशन में ट्रांसफर अनुचित माना जाएगा।”
इसके अलावा, अधिवक्ताओं ने यह भी बताया कि अरुन्धती की 77 वर्षीय माता के. भगवती, मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं और उनका इलाज दुर्ग जिले में ही चल रहा है। ऐसे में उन्हें घोर अनुसूचित क्षेत्र बीजापुर स्थानांतरित करना अव्यवहारिक, अमानवीय और नियमों के विपरीत है।
🔹 सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
अधिवक्ताओं ने अपने तर्क में एस. के. नौशाद रहमान बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का भी हवाला दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि —
“स्थानांतरण नीति को केवल प्रशासनिक औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से लागू किया जाना चाहिए।”
इन न्यायिक दृष्टांतों के आधार पर याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उनका ट्रांसफर आदेश मनमाना, असंवेदनशील और पारिवारिक हितों की अनदेखी करते हुए जारी किया गया है।
🔹 हाईकोर्ट का निर्णय और तर्क
सभी पक्षों को सुनने के बाद, न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू ने माना कि इस मामले में प्रस्तुत परिस्थितियों को देखते हुए अंतरिम राहत देना उचित है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत स्थिति, बच्चे की पढ़ाई और माता की बीमारी जैसे मानवीय पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसलिए अदालत ने तकनीकी शिक्षा एवं रोजगार विभाग तथा राज्य शासन को निर्देश दिया कि वे अरुन्धती को उनके मूल कार्यस्थल महिला आईटीआई, दुर्ग में ही पदस्थ रखें, जब तक कि याचिका का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता।
🔹 राज्य शासन की नीति पर न्यायिक टिप्पणी
अदालत के इस आदेश से एक बार फिर यह बात स्पष्ट हुई है कि स्थानांतरण केवल प्रशासनिक सुविधा का विषय नहीं है, बल्कि उसमें कर्मचारी के पारिवारिक और सामाजिक पक्ष को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दिया कि शासन की ट्रांसफर नीति को लागू करते समय अधिकारियों को संवेदनशीलता और मानवीय संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
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